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ना दिला पाया ....पत्नी के नाम | आलोक सिंह भारद्वाज

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ना दिला पाया .......! मेरी प्रिय पत्नी के नाम शादी के आठ बसंत बीत गए , कितने सपने साथ जी लिए। अपनी कही हुई बातों को , हमने मिलकर याद किए। आज तीज के इस पावन पर्व पर , कुछ शब्द तुम्हारे नाम लिखे हैं। जो दिल में था , जो कह न सका , वो भाव आज इन पंक्तियों में रखे हैं। ना घर दिला पाया , ना कार दिला पाया , ना पाजेब , ना गले का हार दिला पाया। ना कोई बड़ी खुशी , ना कोई बड़ा त्योहार दिला पाया , जो सपनों में था तुम्हारे , ना वो सुख-संसार दिला पाया। जो दिला पाया , उसमें मेरी कोई मेहरबानी नहीं , जो आपने पाया , वो आपकी मेहनत है , कोई खानदानी नहीं। आपकी आँखों में जो सपने हैं , उनका हर रंग निराला है। आपके त्याग और समर्पण ने , मेरे जीवन को सँभाला है। खुशी होती है देखकर , आपका हर छोटा-बड़ा समर्पण। आपका ये प्रेम , मेरे आत्मचिंतन का है दर्पण। ना दिला पाया बहुत कुछ , इसका मलाल रहेगा। पर आपके प्रेम का ये ऋण , मेरे जीवन भर साथ चलेगा। — आलोक सिंह भारद्वाज  

देखना जरुर !

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                                                                                                                 देखना ज़रूर ! जब मंज़िल तय हो, तो बस— सीधा देखो, और चलते चले जाओ। रुको मत, थको मत, बस आगे बढ़ते जाओ। लाख अँधेरों के बीच अगर रौशनी की एक किरण भी दिखे— उसकी ओर ही सही, मगर चलते जाओ। दरवाज़े बंद मिलें, तो खिड़की से देखना। खिड़कियाँ भी बंद मिलें, तो तलाशना रौशनदान। और अगर रौशनदान भी न मिले— तो देखना अपने अंतर्मन के नेत्रों से। मगर… देखना ज़रूर। क्योंकि रास्ते हमेशा दिखाई नहीं देते— कभी-कभी उन्हें देखने की इच्छा ही उन्हें जन्म देती है। और वही रास्ते धीरे-धीरे हमें वहाँ ले जाते हैं— जहाँ हमारी मंज़िल हमारा इंतज़ार कर रही होती है। — आलोक सिंह भारद्वाज

भविष्य देख सकता है - आदमी

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भविष्य देख सकता है - आदमी  कहते हैं— कोई अपना भविष्य नहीं देख सकता। मैं कहता हूँ— देख सकता है। हर वो आदमी देख सकता है जो चलना चाहता है। जो चलते-चलते धूप में जलना चाहता है, पानी में बहना चाहता है, और लोगों की शिकवा-शिकायतों को सहना चाहता है। सोचो— क्या तुम तैयार हो? तैयार हो अपने पैरों के नीचे की सड़क बदलने के लिए? तैयार हो अपने चेहरे पर पड़ती धूप को आईना मानने के लिए? देखना चाहते हो बाहर की दुनिया? उसके रंग? उसके तरह-तरह के ढंग? तो फिर— चलो। शुरू करो। आज से। अभी से। कोई शिकवा नहीं। कोई शिकायत नहीं। न बीते हुए कल से, न इस वर्तमान से। न मंदिर से, न श्मशान से। न हिन्दू से, न मुसलमान से। न खेत से, न खलिहान से। न पड़ोसी से, न खानदान से। शिकायत करनी ही है तो करो— अपने अकेले होने के डर से। अपने भीतर पलती उस झूठी शर्म से। हर दिन दोहराए जाने वाले उन गलत कर्मों से, जिन्हें तुम जानते हो फिर भी करते हो। शिकायत करो अपने उस डर से जो तुम्हें चलने नहीं देता। उस झूठ से जो तुम्हें खुद से मिलने नहीं देता। उस बहाने से जो हर रात तुम्हारे सिरहाने बैठकर कहता है— “कल से शुरू करेंगे।” नहीं। कल नहीं। आज। अभ...

मृदु भाषी हो तो मधुर बोलो.....!

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मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, ये कटुता कहाँ से लाते हो। बार-बार और हर बात में तुम, क्यों दूसरों को गालियाँ सुनाते हो। तुम जो हो, वो पता है मुझे, फिर मुझको क्यों बताते हो। मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, ये कटुता कहाँ से लाते हो। अपने-गैर, ऊँच-नीच का, ये भेद तुम्हीं बढ़ाते हो। जब काम निकल जाता अपना, फिर जोर-जोर से मुस्काते हो। हमने देखा है वो सब करके, जिससे तुमको जान सकूँ। चेहरा तो देखा ही है मैंने, बस भीतर से पहचान सकूँ। आदमी अच्छे हो, ये पता है मुझे, पर आदत तुम्हारी बहुत बुरी है। एक तरफ मुँह में शक्कर रखते, एक तरफ धारदार छुरी है। अरे इंसान हो, इंसानियत रखो, रिश्तों में कोई व्यापार नहीं। हर चीज़ तो मिल जाती है, मिलता बस अच्छा व्यवहार नहीं। मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, मन में प्रेम जगाते चलो। शब्दों से रिश्ते बनते हैं, शब्दों से मत उन्हें तोड़ो। -आलोक सिंह भारद्वाज 

टूटी टहनी का सन्देश

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आपस में प्यार पूरा था, दिल जिसके बिना अधूरा था। रिश्तों में जो अधूरा था, उसे भी पूरा किया गया। पर मानो किसी की नज़र लगी, एक पल में वह सब टूट गया। अब टूट गया तो टूट गया, इस पर इतना क्या रोना है? टूटे पेड़ों की टहनी देखो, तने से निकलते आँसू देखो। तने में लगे पत्तों को देखो, दोनों को ऐसा लगता होगा— जुड़े रहते तो हरे रहते, तने के साथ खड़े रहते। चारों ओर हरियाली होती, आँधी आती, रखवाली होती। पर तना ज़रा घबराया था, टहनी के टूट जाने से। कंधों पर भार उठाया था, हर आँधी के आ जाने से। आँधी का आना तो तय है, फिर टूट जाने का भय है। क्या टहनी टूट जाने पर पेड़ इतना शोक मनाता है? क्या बीती बातों को कोई इतनी बार दोहराता है? अरे, उठो चलो, फिर शुरू करो, कई फल नए उगाना है। नए पत्तों और टहनियों को पेड़ बनकर दिखाना है! -आलोक सिंह भारद्वाज 

हम अपने हर एक दिन को उपयोगी इस प्रकार से बना सकते हैं

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  परिचय हर व्यक्ति अपने जीवन में सफल होना चाहता है | हर व्यक्ति के लिए उसके सफलता के मानक अलग अलग हो सकते हैं पर ये तय बात है की किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन का एक मिनट भी व्यर्थ बीत जाना पसंद नहीं है | ऐसे में व्यक्ति अपने तरफ से अपने एक एक मिनट का सही उपयोग करना चाहता हैं पर यह चाहत बहुत हद तक संभव नहीं हो पाता है | क्यों कि चाहना और होना दोनों में बुनियादी अंतर है और ये अंतर हम अपने आप को अनुशासित करके और इसकी बेहतर योजना बनाकर ठीक कर सकते हैं | इस लेख मे उसी योजना की बात की गयी है जिससे हमारा एक-एक मिनट उपयोगी होकर पूरा दिन काफी उत्पादक बन सकता है | ये सभी प्रयास बहुत आसान और सुलभ भी है | तो आईये हम अपने एक एक दिन का सही उपयोग करना सीखे और जीवन में एक बड़ा बदलाव स्थापित करें | पुरे दिन की योजना का निर्माण हम हर दिन चाहते हैं की आज के इस एक दिन में हम आवश्यक सभी कार्य पूरा करेंगे | हम करने का प्रयास भी करते हैं पर दिन पूरा होते होते हमें निराशा हाथ लगती है | कुछ कार्य पुरे हो जाते हैं एवं कुछ कार्य अधूरे रह जाते हैं | इसमे से कुछ कार्य जो पुरे होते हैं वो आज के लिए के लिए ब...